चुनाव चाय और चर्चा का संगम,सियासत का दृश्य है विहंगम।


[नगरीय सरकार बनाने के लिये छिड़ा महासंग्राम]

[जितेन्द्र तिवारी-ब्यूरो रिपोर्ट]
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चौपाल-:
======चाय की केतली से निकलती गर्म भाप और भट्टियों के धधकते कोयले की लपक के बीच गरमाती सियासत चाय के प्याले के साथ चुसकी लेते मतदाताओ के बीच अपने पक्ष में वोटर को लुभाने के लिए गिड़गिड़ाते प्रत्याशी, नेता…! दरकार वोट पाने की,मनसूबे जीत जाने का,समझौता हर वादा निभाने का,कुछ ऐसा ही है इस वक्त के लोकतन्त्र का नजारा। नगरीय सरकार बनाने के लिए ठनी जद्दोजहद अपने अंतिम दौर में है प्रत्याशी से लेकर कार्यकर्ता और नेता दरवाजे दर दरवाजे घूम घूम कर मतदाताओ की चौखट पर मस्तक टेक दस्तक दे रहे है।गली नुक्कड़ चौराहो पर गर्म होती चुनावी चर्चाओ से आवाज कुछ इस तरह उठती है कि फलाना प्रत्याशी अच्छा लड़ रहा है फलाना फलाने का वोट काट कर फलाने दल के उम्मीदवार को फायदा पहुंचा रहा है बातचीत के इस दौर में चर्चा कुछ देर में ही गर्म होती जाती है तो जीत हार का गुना भाग भी गर्म चाय की चुसकी के साथ लगाया जा रहा है।तो बगल से आवाज़ आई कि इतना कठिन चुनाव न होता तो बूथ बूथ पर इतना घूमना न पड़ता…।बड़े बड़े योद्धाओ को मैदान पर उतरना न पड़ता…। यानि मुश्किल तो है… चुनाव जीतना कितना जरूरी है और जीत बिना सियासी दांव पेंच के सरल है नही तो मुकबला कांटे का होना स्वभाविक है। नगरीय सरकार का नजारा और चुनावी समीकरण नगर के होटल पर खड़े होकर चाय की चुसकी के साथ सर्वे और एग्जिटपोल सब अपने अपने तरीके से निकल कर बाहर आ ही जाता है।कहते है अगर चुनावी माहौल का दाँव-पेंच और सियासी करवट के साथ सत्ता की सुगबुगाहट का अंदाजा लगाना है तो प्रतिष्टित चाय की दुकान पर चुसकी के साथ सियासत की खुसबू भी आने लगती है।

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