जातिगत जंजीर में जकड़ा हमारा प्यारा ग्रामीण भारत-हरिओम तिवारी

सुविचार ! साथियों भारत एक लोकतांत्रिक और धार्मिक और सामुदायिक देश है।जहां युवाओं में चुनाव का बढ़ा वोट केंद्र भारतीय राजनीति में बना रहता है यहां चुनाव को लोकतांत्रिक पर्व की तरह बनाया जाता है।भारत में राजनीतिक राज्य में नीति करने की तरह है।आज छोटे छोटे दलों द्वारा की जा रही जातिगत राजनीति पर दुख प्रकट करते हुए मिल्कीपुर के युवा जागरूक समाजसेवी ने कहा कि आज हमारा प्यारा ग्रामीण भारत जातीय राजनीति की जंजीर से जकड़ दिया गया है।जिससे लोगों में आपसी प्रेम सदभाव की जगह ईर्ष्या द्वेष पनप रही है जो आने वाले कल के लिये बहुत बड़ा खतरा है।
इन्होंने कहा कि क्या जातियों के आंकड़े इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि जाति आधारित वोट बैंक की राजनीति को और दृढ़ किया जा सके? आज हम इतने जाति-परस्त क्यों हो गए हैं कि हमें केवल अपनी जाति और उसकी संख्या में ही दिलचस्पी है? भारतीय संविधान तो एक मिसाल है जो सबको वयस्क मताधिकार देकर यह सुनिश्चित करता है कि सामाजिक संख्या बल को राजनीतिक शक्ति का हथियार बनाया जा सकता है। यदि कोई सामाजिक वर्ग बहुसंख्यक है तो ध्यान इस पर होना चाहिए कि उस सामाजिक वर्ग को कैसे एकता के सूत्र में पिरोया जाए? कैसे उस संपूर्ण सामाजिक वर्ग को एक साथ ऊपर उठाया जाए? लेकिन जब उस सामाजिक वर्ग के अंदर ही स्वयं उपजातीय प्रश्न मुखर हों और आर्थिक असमानताएं गंभीर हों तो फिर उस सामाजिक वर्ग के हिमायती बनने का क्या औचित्य?इन्होंने कहा वास्तव में अगर संपूर्ण समाज को देखा जाए तो जातीय राजनीति के चलते हम वर्तमान के लिए भविष्य को कुर्बान कर रहे हैं। अगर भारत में जाति तीन हजार वर्ष पुरानी संस्था है और उसकी विसंगतियां भी उतनी ही पुरानी हैं तो उससे तो कोई इंकार नहीं कर सकता, लेकिन उस व्यवस्था को तो हम स्वतंत्रता प्राप्ति और संविधान-निर्माण के साथ ही छोड़ने का संकल्प ले चुके हैं। फिर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जन्मे जिन भारतीयों ने जातिगत शोषण में कोई सहभागिता न की, उनको भी उसका दंड क्यों भुगतना पड़ रहा है, उनका प्रतिलोम-शोषण पिछले 70 वर्ष से अनवरत चल रहा है और अभी निकट भविष्य में उसकी कोई सीमा रेखा भी दिखाई नहीं देती। कोई भी राजनीतिक दल इस संवेदनशील प्रश्न में अपना हाथ नहीं डालना चाहता। अफसोस तो इस बात का है कि रोज ‘क्रीमी-लेयर’ की परिभाषा बदलकर पिछड़े वर्ग के अति-पिछड़ों को अनवरत वंचित रखने का खेल चल रहा है।प्रधानमंत्री मोदी जी के कार्यो को देख हमने ऐसा महसूस किया था कि अभी देश में ऐसा दमदार नेतृत्व वाला है जो जाति से ऊपर उठकर विकास की बात करता है।लेकिन अभी बीते दिनों हुए चुनाव में छोटे छोटे दल एक बहुसंख्यक समाज को लेकर उस व्यक्त को हटाने की गलत सोंच रख रहे है।इन्होंने कहा क्यों हमारे लिए ‘गरीब’ महत्वपूर्ण नहीं होना चाहिए चाहे वह किसी भी जाति का हो? गरीबी न केवल रोजमर्रा की जिंदगी के लिए एक अभिशाप है, बल्कि वह मनुष्य में आत्मविश्वास खत्म कर देती है और जीवन के संघर्ष से निपटने में कमजोर कर देती है। क्या हमें जाति की जगह आर्थिक वर्ग व विकास की बात नही करनी चाहिए?आखिर क्यों नहीं हट पा रही है गरीबी? कहां कमी रह जा रही हैं? कहीं न कहीं हमारी लोकतांत्रिक राजनीति और प्रशासन ‘सुशासन और लोक-कल्याण’ के पैमाने पर सफल नहीं हो पा रहा है। लोगों को कितना सब्र करना पड़ेगा? कहीं ऐसा न हो कि जनता के सब्र का बांध टूट जाए और उसकी लोकतांत्रिक प्रतिबद्धताएं कमजोर पड़ जाएं? इस खतरे से निपटने के लिए समाज के उन लोगों को राजनीति में उतरना पड़ेगा जो अभी हाशिये पर बैठ कर यह उम्मीद करते हैं कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा।

चुनाव हो गया अब भारत माँ को भी चैन की सांस लेने दो।

आज कंकरीट के महल के निर्माण के लिये वो लोग अपने गाँव की माटी छोड़कर उन महलो को बनाने के लिये अपने श्रम पसीने को भी उसको समर्पित कर दिया।लेकिन क्या वही अमीर लोग रजवाडे की चाहत अपने सीने में रखे हुए कभी उस पसीने की कीमत उनके मुसीबत में साथ देंगे।क्या कभी उस वृहंग्य मय दृश्य को भारत माता अपने उस नेत्र से दर्शन कर पायेगी जो नेत्र उनके त्याग का भोग अमीर ग़रीब सब कर रहे है।मेरा बस आप लोगों से निवेदन है कि अब चुनाव हो गया है अब भारत माता को चेन कीं साँस लेने दो।कल व्यापारी नोकरी वाला घर से बाहर अपने जीवन यापन के लिये जायेगा। उसको अपने पड़ोसी से हिन्दु मुस्लिम के नाम पे क़त्लेआम ना करने देना।

सब नर करही परस्पर प्रीति,चलही स्वधर्म निरत श्रुति नीति

रामराज्य’ में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते है।देश मे गिरते राजनीति के स्तर व नेताओं की बदजुबानी व उनकी सोंच सहित ग्रामीण भारत मे बढ़ती जातिगत राजनीति पर दुःख प्रकट करते हुए मिल्कीपुर के युवा समाजसेवी हरिओम तिवारी ने अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा कि आख़िर कब आयेगा मेरे राम जी के सपनो का देश।

राजनीति: ग्रामीण विकास और समग्रता

ग्रामीण विकास का लक्ष्य हासिल करने के लिए सबसे जरूरी है पंचायतों को मजबूत करना। इसके लिए पंचायतों को अधिक संसाधन मिलने चाहिए। पंचायत चुनावों से गांव में गुटबाजी व दुश्मनी न आए, इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए। न्याय के लिए कोर्ट-कचहरी में भटकने के स्थान पर निशुल्क न्याय पंचायत स्तर पर हो सके, इस दिशा में बढ़ना चाहिए। ग्राम सभा और वार्ड सभा को सशक्त बनाना होगा।

राजनीत से दूर एकान्त चिन्तन .

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