चौपाल परिवार की ओर से आज का प्रातः संदेश-आचार्य अर्जुन तिवारी की कलम से

चौपाल प्रेमियों !इस संसार में किसी भी जप , तप , स्वाध्याय , पूजन या व्रत के लिए शरीर का स्वस्थ रहना परम आवश्यक है।जब शरीर अस्वस्थ होकर दुर्बल हो जाता है तो मनुष्य चिड़चिड़ा हो जाता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य को कुछ भी नहीं अच्छा लगता है।शरीर को स्वस्थ रखने के लिए जिस प्रकार पौष्टिक आहारों की आवश्यकता होती है ठीक उसी प्रकार सप्ताह में एक प्रकार से सभी प्रकार के आहारों का त्याग करना अर्थात व्रत रहना भी आवश्यक है। संसार के लगभग सभी धर्मों ने व्रत की उपयोगिता को समझ कर अपने धर्म के अनुसार उसकी व्याख्या करके व्रत रहने का विधान बनाया है।व्रत का सीधा सा अर्थ है—— संकल्पित होना ! किसी विषय विशेष को केंद्र में रखकर देव सत्ता का सानिध्य प्राप्त करना या सानिध्य प्राप्त करने के उद्देश्य से किया गया उपक्रम जी व्रत कहा गया है।हमारा शरीर नित्य अनेक प्रकार के व्यंजनों का उपयोग करता है जिससे कभी-कभी इनकी अधिकता हो जाने पर शरीर में अनेक व्याधियां उत्पन्न हो जाती हैं।उनसे बचने के लिए एक दिन के लिए सभी प्रकार के खाद्य पदार्थों का त्याग करके व्रत किया जाता है , जिससे हमारे पाचन तंत्र को कम से कम एक दिन का आराम मिल सके और भी अपना कार्य सुचारु रुप से कर सकें। हमारी मान्यता है की आत्मा में ही परमात्मा का निवास होता है , अतः आत्मा को कष्ट देकर कोई कार्य नहीं करना चाहिए। कोई भी व्रत करना हो तो निर्जल ही रहना चाहिए , यदि निर्जल रहने में कष्ट होता है तो एक बार जल पी लेना चाहिए , जल पीने पर यदि आत्मा को संतुष्टि नहीं मिलती है तो उचित फलाहार ले लेना चाहिए , फलाहार लेने पर भी यदि आत्मा कुछ कष्ट में होती है तो मनुष्य को एक समय भोजन कर लेना चाहिए। इतने में भी यदि बार-बार मनुष्य का मन खाद्य पदार्थों की ओर आकर्षित हो तो कोई भी व्रत नहीं रहना चाहिए।

आज बदलते परिवेश एवं भौतिकवाद के रंग में रंगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार अपने प्रत्येक त्यौहारों को भौतिकता में रंग रहा है उससे व्रत भी अछूता नहीं रह गया है। आज के परिवेश में व्रत का भी स्वरुप बदल गया है जो व्रत पहले निराहार रहने के लिए जाना जाता था आज वही व्रत तरह तरह के व्यंजन चखने का साधन बन गया है।किसी भी व्रत के एक दिन पहले से ही फलाहार में प्रयुक्त होने वाली खाद्य पदार्थों का सामग्रियों का संग्रह प्रारंभ हो जाता है।सुबह दोपहर एवं शाम को बदल-बदल कर फलाहार किया जाता है एवं रात्रि में पुष्ट फलाहार लेकर के मनुष्य सो जाता है। जैसा कि बताया गया है कि पाचन तंत्र को आराम देने के लिए व्रत रहने का विधान है परंतु आज व्रत वाले दिन पाचनतंत्र को अधिक ही परिश्रम करना पड़ता है। मैं “आचार्य अर्जुन तिवारी” अब तक जो जान पाया हूँ उसके अनुसार व्रत रहने का अर्थ है तपस्या करना , त्याग करना।अपनी किसी परम प्रिय वस्तु का त्याग करना ही व्रत का असली मतलब है।वैज्ञानिकों का भी मानना है कि प्रत्येक मनुष्य को सप्ताह में कम से कम एक दिन आहार का त्याग अवश्य करना चाहिए। परंतु अब व्रत का स्वरुप बदल गया है। कोई भी व्रत रहने के पहले आवश्यक है कि व्रत के स्वरूप और उसकी उपयोगिता को अवश्य जान ली जाय , अन्यथा व्रत रहने का कोई औचित्य नहीं है।

आज के व्रत उपवास का स्वरूप कितना बदल गया है यह बताने का नहीं अपितु चिंतन करने का विषय है।

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