साथियों ! मनुष्य को सदैव अपनी मर्यादा का पालन करते रहना चाहिए।मनुष्य की मर्यादा क्या होती है इसकी शिक्षा मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम से मिलती है।पावन अयोध्या धाम में महाराज दशरथ के महल में चैत्र मास की शुक्लपक्ष की नवमी को मध्याह्नकाल में भगवान श्री राम का प्राकट्य हुअ। प्रतिवर्ष हम सभी बड़े हर्षोल्लास के यह पर्व मनाते चले आ रहे हैं।एक दिन यह पर्व मनाकर हम फिर इसे या भगवान राम के बताये मार्गों को भूलने लगते हैं।मर्यादापुरुषोत्तम की मर्यादा का पालन करना आज हमें दुरूह ही लगता है।लोग कहते हैं कि श्री राम भगवान थे और हम मनुष्य।हमारे वेद पुराण बताते हैं कि श्री राम कण कण में व्याप्त हैं। जब वे कण कण में व्याप्त हैं तो क्या हमारे अन्तर्मन में नहीं हैं ???? प्रत्येक प्राणी के रोम रोम में श्री राम समाये हुए हैं।आवश्यकता है कि हम अपने अन्दर छुपी हुई भगवान राम की शक्ति को पहचानते हुए उसे जागृत करने का प्रयास करें। जब हम श्री राम की उस उस शक्ति का स्मरण अपने भीतर करने लगेंगे तो कोई भी कार्य असंभव नहीं रह जायेगा।प्रत्येक मनुष्य के भीतर एक पवित्र आत्मा होती है औरी प्रत्येक आत्मा में परमात्मा का वास होता है।जब यह सिद्धी हो चुका है कि प्रत्येक आत्मा में परमात्मा का वास है तो इसका अर्थ यह हुआ कि मनुष्य द्वारा किये गये सारे कार्य परमात्मा द्वारा ही सम्पादित होते हैं।परंतु मनुष्य की मानसिकता इतनी निम्न हो गयी है कि वह समर्पण करने में अपना अपमान समझता है। जब उसके द्वारा किया गया कोई कार्य सफल हो जाता है तो उस सफलता का सारा श्रेयी स्वयं ले लेता है ! तब वह अपने भीतर बैठे परमात्मा को भूल जाता है कि यह कार्य उस अदृश्य परमात्मा द्वारा किया गया है | परंतु जब वह किसी कार्य में असफल होता है तो सारा दोष परमात्मा को लगा देता है कि सारा कार्य भगवान ने बिगाड़ दिया।आज भी यह मानना है कि प्रत्येक मनुष्य के रोम रोम में श्री राम समाये हैं।श्री राम की तरह असीम शक्ति प्रत्येक मनुष्य में है परंतु वह अपनी शक्ति को पहचान नहीं पाता है।अपनी असीम शक्तियों को सक्रिय करने के लिए मनुष्य को एकाग्र होना पड़ेगा।जब मनुष्य एकाग्रचित्त होकर कोई कार्य करता है तो मनुष्य की ऊर्जा जागृत होकर सारा कार्य सफलता के साथ पूर्ण करती है।जहाँ तक मैं “आचार्य अर्जुन तिवारी” समझ पा रहा हूँ कि सनातन धर्म में संध्या वन्दन करने का विधान शायद इसीलिए बनाया गया है कि मनुष्य इसी के माध्यम से एकाग्र होकर अपनी सुप्त शक्तियों को जागृत कर सके।मनुष्य के मस्तिष्क की शक्ति असीमित है बस आवश्यकता है इसे एकाग्र करके चरम पर पहुँचाने की।प्राय: मनुष्य को नकारात्मक विचार घेरे रहते हैं और मनुष्य इन्ही नकारात्मक विचारों में फंसकर अपनी सकारात्मक शक्तियों को भूल जाता है और निराशा के सागर में डूबने लगता है।जब मनुष्य में नकारात्मकता को पिछाड़कर सकारात्मक विचार उत्पन्न होते हैं तो मनुष्य की आंतरिक शक्ति जागृत हो जाती है।रावण का वध करने के लिए उसकी विशाल सेना के समक्ष कुछ भालू और वन्दरों के साथ अपनी सकारात्मक शक्तियों को जागृत करके ही भगवान श्री राम ने चढाई की थी।जिस प्रकार कस्तूरी मृग की नाभि में होते हुए भी मृग उसकी सुगंध को पूरे जंगल में ढूंढा करता है उसी प्रकार अपने भीतर समाये हुए परमात्मा को मनुष्य अन्यत्र ढूंढा करता है।श्री राम नवमी का पर्व मनाना तभी सार्थक होगा जब हम अपने भीतर समाये हुए श्री राम की शक्तियों को जागृत करते हुए उनके आदर्शों / मर्यादाओं का पालन करने का प्रयास करते हुए सनातन की पुनर्स्थापना का प्रयास करेंगे।

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