अयोध्या लोकसभा: एक बड़ी चुनौती ,बीएसपी और एसपी के वोट एक-दूसरे को ट्रांसफर होना?

आयोध्या।फैज़ाबाद लोकसभा के रहने वाले दलित नेता इन दिनों बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। जिन्होंने करीब 24 साल बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) में गुजारे लेकिन अब पहली बार अपने भाषण का अंत ‘जय भीम, जय भारत’ से नहीं करना पड़ रहा है। समाजवादी पार्टी के साथ हुए अलायंस का सम्माकन करने के लिए उन्हेंह अब इसके बाद ‘जय लोहिया, जय समाजवाद’ भी कहना पड़ रहा है। बीएसपी नेताओं की तरह ही एसपी के नेताओं को भी नारे लगाने पड़ रहे हैं जो समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया को अपना आदर्श मानते हैं। एसपी के नेता और कार्यकर्ता दलितों के आदर्श बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर, कांशीराम और मायावती का नाम लेने के बाद ही भाषण की शुरुआत कर रहे हैं। यह कुछ उसी तरह से है जैसे दोनों ही दलों के झंडे एक-दूसरे से मिल गए हैं। वोटों का आपस में ट्रांसफर किया जाना बेहद महत्वकपूर्ण आपसी मतभेदों को भुलाकर एसपी-बीएसपी के एक साथ आ जाने के बाद एक-दूसरे के आदर्श नेताओं के प्रति स्ने ह के प्रदर्शन के बीच लाख टके का सवाल अभी भी बना हुआ है। क्या वे अपने वोटों (एसपी का यादव और बीएसपी के पासी कोल, धानुक, ) को ट्रांसफर कर पाएंगे या नहीं। हालां‍कि दोनों दलों के बीच दोस्तीो से अलायंस का विरोध करने वाले शांत हो गए हैं। मायावती के दलित वोट बैंक में सेंधमारी के प्रयास में कांग्रेस करीब दो दशक तक एक-दूसरे के शत्रु रहने वाले दोनों ही दलों के लिए वोटों का आपस में ट्रांसफर किया जाना बेहद महत्ववपूर्ण हो गया है। यह आश्चकर्य वाली बात नहीं है कि जब 1995 में मायावती पर एसपी कार्यकर्ताओं के हमले की बात होती है तो दलित नेता इसे दिलों का गठबंधन बताते हैं। उनका कहना है कि, ‘हम आगे बढ़ गए हैं। वस्तुमत: यह एक ऐसा गठबंधन है जो जनता के दबाव में हुआ है। हमें एक-दूसरे के महापुरुषों का सम्माठन करना है।जानें वोटों का गणितदोनों दलों के नेता चाहे जो कहें लेकिन इस ‘सम्माेन’ को जमीनी स्त:र पर दिलाना आसान नहीं है। वह भी तब जब सूबे में यादवों और दलितों के बीच शत्रुता का इतिहास रहा है। अयोध्या दर्शननगर के दलित किसान राम अनुज कहते हैं कि मायावती ने एसपी के साथ गठबंधन करके दलितों की आकांक्षाओं का अपमान किया है। उन्हों ने कहा, ‘एसपी के शासनकाल में गुंडे खुलेआम घूमते थे। और यदि गुंडाराज वापस आने जा रहा है तो दलित न्या य के लिए किसके पास जाएंगे।’ एक दलित बहुल गांव के रहने वाले रमेश कुमार इससे सहमत हैं। वह कहते हैं, ‘यादव और दलितों की दोस्तीे आज तक नहीं चल पाई। इस गठबंधन में बहन जी को सबसे ज्यारदा नुकसान होगा क्यों कि अखिलेश यादव को ज्याधदा सीटें मिलेंगी। जहां हम अपने वोट उन्हें ट्रांसफर करेंगे लेकिन उनके वोट हमें नहीं मिल पाएंगे।’ उन्होंजने स्वी कार किया कि वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में कुछ दलितों ने बीजेपी को वोट दिया था।एसपी को चुनना आग और तवे के बीच चुननाकुमार कहते हैं कि एसपी को चुनना आग और तवे के बीच चुनना है। वर्तमान सरकार में कम से कम इतना तो है कि यादवों का कोई डर नहीं है। कुमार से इतर कई ऐसे भी हैं जो बीजेपी को हराने के लिए इस महागठबंधन का समर्थन करते हैं। उधर, यादवों की अपनी चिंता है लेकिन माधवपुर गांव के बृजेश सिंह कहते हैं कि यह वोटों के ट्रांसफर में आड़े नहीं आएगा। कई जातीय फैक्टर दे सकते हैं दखल, सवाल इस चुनाव में क्या होगा जनता का मुद्दा। पिछले दो चुनाव में टूटे थे जातीय बंधन, 2009 में कांग्रेस तथा 2014 में भाजपा के कब्जे में आयी थी सीट अयोध्या। यूपी की सियासत को राजनीतिक विश्लेषक जातीय आधार पर बांटते हैं। शायद यही कारण है कि पार्टियां भी टिकट देते समय जातीय समन्वय की बातें कहती हैं। फैजाबाद लोकसभा का जातीय समीकरण भी चुनाव की दृष्टि से काफी अहम है। हालांकि पिछले अगर चुनावों पर नजर डालें तो यहां जातीय बंधन टूटें थे। इन सबको लेकर इस बात का कयास लगाये जा रहे हैं कि इस चुनाव में जनता का मुद्दा क्या होगा। हालांकि जातीय आधार पर वोट क्षेत्र के विकास को पीछे ले जाते है। पाटियां इसको जनता को समझाने में कितनी सफल होती हैं अथवा कुछ जातीय आंकड़े में फंस जाती है यह चुनाव के परिणाम बतायेंगें। अगर कुछ जिम्मेदार राजनीतिक लोगो द्वारा बताये आंकड़ों को हम सही माने तो फैजाबाद लोकसभा में 30 प्रतिशत अति पिछड़े मतदाता हैं। 19 प्रतिशत अनुसूचित जाति तथा मुस्लिम 16 प्रतिशत है। ब्राहमण 10 प्रतिशत, क्षत्रिय 9 प्रतिशत, यादव 9 प्रतिशत तथा कुर्मी 4.5 प्रतिशत हैं। 2 प्रतिशत वैश्य तथा 1.5 प्रतिशत कायस्थ वोटर हैं। यह लगभग जातीय समीकरण है। पिछली बार मोदी लहर में जातीय समीकरण टूट गये थे। चुनाव में भाजपा को 48.63 प्रतिशत वोट मिले थे। दूसरे नम्बर सपा को 20.66 प्रतिशत वोट मिले थे। बसपा व कांग्रेस को करीब 13 से 14 प्रतिशत वोट मिले थे।

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