August 10, 2026

बाराबंकी : अंग्रेजों से आर-पार की लड़ाई चाहते थे डा0 लोहिया: नवीन तिवारी

IMG-20260810-WA0036

भारत के सम्मान, बलिदान और संप्रभुता के संघर्ष की याद दिलाता है 9 अगस्त: रामसेवक,अगस्त क्रान्ति दिवस और काकोरी ट्रेन एक्शन की वर्षगांठ पर परिचर्चा में वक्ताओं ने रखे विचार।

बाराबंकी। गांधी भवन में रविवार को लोकतंत्र सेनानी कल्याण समिति उत्तर प्रदेश एवं गांधी जयन्ती समारोह ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में अगस्त क्रान्ति दिवस की 85वीं वर्षगांठ और काकोरी ट्रेन एक्शन की 101वीं वर्षगांठ पर परिचर्चा आयोजित हुई। परिचर्चा के मुख्य वक्ता प्रख्यात समाजवादी चिन्तक एवं आचार्य नरेन्द्र देव समाजवादी संस्थान के संयुक्त सचिव नवीन तिवारी रहे। वहीं सभा की अध्यक्षता लोकतंत्र सेनानी कल्याण समिति के प्रदेश अध्यक्ष रामसेवक यादव ने की। कार्यक्रम की शुरूआत झण्ड़ारोहण से हुई, तदोपरान्त महात्मा गांधी की मूर्ति पर श्रद्धा सुमन अर्पित किया गया। मुख्य वक्ता नवीन तिवारी ने कहा कि डॉ लोहिया अंग्रेजों से आर-पार की लड़ाई चाहते थे। डॉ लोहिया के इस दबाव में महात्मा गांधी आए और उन्होंने ‘करो या मरो’ का नारा दिया। वहीं यूसुफ मेहर अली पहले नेता थे जिन्होने ‘’भारत छोड़ो’’ नारा देकर इस लड़ाई को निर्णाक मोड़ दिया। उन्होंने बताया, 8 अगस्त को मुम्बई के सम्‍मेलन में जवाहरलाल नेहरू ने ‘भारत छोड़ो’ का प्रस्‍ताव पेश किया। सरदार पटेल ने इसका अनुमोदन किया। अन्‍य नेताओं के अतिरिक्‍त आचार्य नरेन्‍द्रदेव, अच्‍युत पटवर्धन तथा डॉ लोहिया ने प्रस्‍ताव का जोरदार समर्थन किया और 9 अगस्त की सुबह अरूणा आसफ अली ने गोवालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहरा दिया। इस पूरे घटनाक्रम में भारतीय जनसंघ और हिन्दू महासभा की नगण्य भूमिका रही।

सभा को सम्बोधित करते हुए गांधीवादी चिन्तक राजनाथ शर्मा ने कहा कि नौ अगस्त 1942 की घटना से पूरे देश ने एक स्वर में पूर्ण स्वराज्य का आह्नान किया था। सही मायने में इसी तिथि को भारत की स्वतंत्रता की निर्णायक तिथि मानकर उत्सव के रूप में मनाया जाना चाहिए। 9 अगस्त का यह दिन जन दिवस है। जब पूरा देश एकजुट होकर महात्मा गांधी के साथ चल पड़ा था। लेकिन 1942 की क्रांति के साथ ही एक अंदरूनी विघटन का वातावरण बनना शुरु हुआ जिसके कारण न सिर्फ औपचारिक स्वतंत्रता में देर लगी बल्कि देश दो टुकड़ों में बँट गया। इस विभाजन की चोट के कारण शायद हम उस आजादी के बिगुल की आवाज को भूल से गए जो 1942 में बजा था। सभा की अध्यक्षता कर रहे प्रदेश अध्यक्ष रामसेवक यादव ने कहा काकोरी ट्रेन एक्शन की शताब्दी केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि हमारे स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी साहस की पुनरावृत्ति है।

यह घटना हथियार उठाने जैसी क्रांतिकारी राजनीतिक कार्रवाइयों की ओर बदलाव का प्रतीक है। इसने हजारों युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया और उन्हें भारत के सम्मान, बलिदान और संप्रभुता के संघर्ष की याद दिलाई। पूर्व विधायक सरवर अली खान ने कहा, 1947 में आज़ादी की नींव का पत्थर नौ अगस्त 1942 को रखा गया। यह दिन उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने का है, जो आधुनिक भारत के शिल्पकार बनें। जिस अहिंसक आन्दोलन की शुरूआत महात्मा गांधी ने की उसे बाद में उन्होंने ‘करो या मरो’ में परिवर्तित कर दिया। जिसके बाद महात्मा गांधी के साथ पूरा देश खड़ा हो गया। उन्होंने कहा, 15 अगस्त महज़ राज का दिवस है। जिस तिथि कोे भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड माउंटबेटेन से कांग्रेस नेतृत्व ने हाथ मिलाकर स्वाधीनता स्वीकार की। सभा का संचालन पाटेश्वरी प्रसाद ने किया। इस मौके पर प्रमुख रूप से बसन्त कुमार शर्मा, सलाउद्दीन किदवाई, शऊर कामिल किदवाई, हुमायूं नईम खान, मुस्तफा हुसैन, मृत्युंजय शर्मा, सभासद अश्वनी शर्मा, बेचई यादव, सुशील गुप्ता, शिवशंकर शुक्ला, दुर्गा प्रसाद, हरि श्याम वर्मा, अशोक शुक्ला, उमानाथ यादव, सत्यवान वर्मा, मो अहमद किदवाई, अताउर्रहमान सज्जन, अम्बरीश वर्मा अनन्त कुमार पाण्डेय सहित बड़ी संख्या में कई जनपदों से आए लोकतंत्र रक्षक सेनानी, प्रबुद्धजन, अधिवक्ता और समाजसेवी उपस्थित रहे।

Discover more from KKC News Network

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading