जन्मदिन की वह रात, मेरी आखिरी रात होती…अगर वह मुसलमान मदद न करता’


इन दिनों आप घोंडा-मौजपुर का नाम सुन रहे होंगे तो आपकी आंखों के सामने हिंसा, जलती दुकानें और वाहनों की तस्वीर सहसा कौंध जाती होगी। लेकिन इस बीच यहां कई लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने धर्म से ऊपर इंसानियत को रखा। ऐसा ही एक किस्सा 24 तारीख की रात मेरे साथ घटा, उस दौरान एक मुसलमान की वजह से मैं घर तक तो पहुंच गया, लेकिन रास्ते का मंजर देख बस यही सोचता रहा कि अगर वह मुझे सुरक्षित न निकालता तो जन्मदिन की रात ही मेरी आखिरी रात बन जाती।

सड़क पर इतने पत्थर मानों किसी ने खोद दिया हो
25 फरवरी को मेरा जन्मदिन था। उससे पहले 24 फरवरी को सीएए समर्थकों और विरोधियों के बीच की हिंसा जाफराबाद से होते हुए मौजपुर, घोंडा, नूर-ए- इलाही और यमुना विहार तक पहुंच चुकी थी। 24 की रात को मैं रिपोर्ट के सिलसिले में मौजपुर (हिंदू इलाका) से होते हुए कर्दमपुरी और फिर गोकलपुर पहुंचा। वहां सड़क पर इतने पत्थर थे, मानों पूरी सड़क खोद दी गई हो। ये सब पथराव में इस्तेमाल हुए पत्थर थे, जो असल में पूरी सड़क पर पसर गया था। जैसे-तैसे मैं गोकलपुर पहुंचा। वहां आखों के सामने टायर मार्केट को जलते और जय श्री राम के नारे सुने। काम निपटाकर बाइक से ही घर की तरफ आ रहा था।

काम नहीं आया प्रेस कार्ड
मौजपुर पर इतना पथराव देख उधर से वापस जाने की हिम्मत नहीं कर पाया। सोचा यमुना विहार से निकल जाउंगा, लेकिन वहां का भी हाल ऐसा ही था। यमुना विहार से होते हुए नूर इलाही की तरफ बाइक से जा ही रहा था कि पुलिसवालों ने रोक दिया। वहां बैरिकेडिंग थी। फिर वापस यमुना विहार की तरफ मुड़ा, उस दौरान मुझे लगा कि बाइक से न सही, प्रेस कार्ड दिखाकर तो नूर-ए-इलाही से पैदल निकल जाउंगा। फिर यमुना विहार में बाइक एक रिश्तेदार के घर खड़ी कर वापस पैदल नूर-ए-इलाही की तरफ बढ़ा। हालांकि, पुलिसवाले मुझे तब भी रोक रहे थे, लेकिन दूसरी तरफ से जाने का रास्ता पैदल के लिहाज से बहुत लंबा था और स्थिति वहां भी अच्छी होगी इसकी कोई गारंटी थी नहीं। इसलिए मैं चलता गया।

‘भाई मुझे यहां से पार निकाल दोगे?’
नूर-ए-इलाही वाला यह रोड सीधा घोंडा चौक की तरफ जाता है, जहां मुझे जाना था। जैसे-जैसे कदम आगे बढ़े देखा कि मुसलमानों का एक समूह वहीं खड़ा था, दिनभर के हालात देख मेरे दिल में भी दहशत थी। तभी मुझे वहां एक मुस्लिम शख्स उधर की तरफ जाता दिखा। तब तक भीड़ दूर थी। मैंने उससे बस इतना कहा भाई मुझे घोंडा जाना है, नूर-ए-इलाही से निकाल दोगे? वह बोला क्यों नहीं भाई, मेरे साथ चलो।

डर रहा था, कहीं भीड़ को न सौंप दे
मेरी बोली से वह समझ चुका था कि मैं उनमें से नहीं हूं। वह बोला, ‘भाई इस प्रेस कार्ड को जेब में रख लो तो बेहतर होगा और चुपचाप बस मेरे साथ चलते रहना।’ मैंने ऐसा ही किया। गले में टंगे प्रेस कार्ड का रौब अब खत्म हो चुका था। मैं समझ चुका था, अब भीड़ कार्ड देखकर भी नहीं छोड़ने वाली। हालांकि, उस दौरान मेरे दिल में डर भी था कि कहीं ये मुझे उस भीड़ के सामने ले जाकर खड़ा न कर दे और कहे पीटो इसे। पर मेरे पास तब कोई और चारा था नहीं। मैं भगवान का नाम लेकर उसके साथ हो चला। जैसे-जैसे भीड़ नजदीक आती गई, दिल की धड़कनें और तेज हो गईं। लोग मेरी तरफ देखते फिर उसे देखते। कोई कुछ नहीं बोला।

एक इशारा पहुंचा सकता था हॉस्पिटल या श्मशान
उस पूरे रोड का नजारा ऐसा था कि हर गली पर सिर्फ एक ही समुदाय विशेष के लोग थे। मुझे मारने-पीटने या जान से खत्म करने के लिए उसका सिर्फ एक इशाराभर काफी था। उस दौरान उन्हें वहां रोकने वाला न पुलिस थी, न कोई और। लोगों में गुस्सा इतना था कि शब्दों में बयां नहीं कर सकता। लेकिन वह मुझे लेकर चुपचाप चलता रहा। आगे भीड़ ने आग लगाई हुई थी।उसने मुझे अंदर की गली में घुसने का इशारा किया। इन सभी इलाकों, सभी गलियों से मैं भी अच्छी तरीके से वाकिफ था। लेकिन उस रात वे सारी गलियां मेरे लिए मौत का कुआं जैसी थीं, लेकिन मैं बस उसपर भरोसा करके साथ चलता चला गया और घोंडा चौक पर आकर निकला और घर पहुंचा।

मौजपुर, जाफराबाद और आसपास में हिंसा भले ही चरम पर हो, लेकिन ऐसे भी कई किस्से हैं, जहां लोग इंसानियत को ऊपर रख रहे हैं। ये किस्से ऐसे वक्त में सामने आए हैं, जब हिंदू इलाके से मुसलमान और मुसलमान इलाकों से हिंदू का निकलना नामुमकिन सा हो गया है। इसी तरह मैंने खुद कई मुसलमानों को हिंदू इलाकों से बचाकर निकालते लोग भी देखे।

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