नेपाल की बाढ़ : तो क्या हिमालय की चेतावनी को अब भी अनसुना करेंगे हम..?
हिमालयी त्रासदी ने विकास के मॉडल, पर्यावरणीय संतुलन और आपदा प्रबंधन पर खड़े किए गंभीर सवाल; भारत-नेपाल को साझा रणनीति की दरकार।
देवानंद शुक्ल-सहसंपादक
नेपाल में नेपाल-तिब्बत सीमा के पास आई भीषण बाढ़ और मलबे के सैलाब ने हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को एक बार फिर पूरी दुनिया के सामने ला दिया है। 26 अगस्त को शुरू हुई इस त्रासदी में पानी के साथ बर्फ, चट्टान और मलबे का विनाशकारी प्रवाह आया। रासुवा, नुवाकोट और आसपास के क्षेत्रों में घर, सड़कें, पुल और बिजली ढांचे बुरी तरह प्रभावित हुए। 27 अगस्त तक नेपाल में सैकड़ों लोगों की मौत और बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की सूचना सामने आई है।
प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियर और चट्टानों के बड़े हिस्से के खिसकने से नदी में भारी मात्रा में मलबा पहुंचा, जिसने अचानक विनाशकारी बाढ़ का रूप ले लिया। इसे महज सामान्य मौसमी बाढ़ मानना इसलिए उचित नहीं होगा। वैज्ञानिक इस घटना में हिमालयी भूगोल, ग्लेशियरों की अस्थिरता और तेजी से बदलते जलवायु परिवेश की भूमिका का अध्ययन कर रहे हैं। हालांकि इस विशेष घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ने के लिए अभी और वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी हैं।
नेपाल की त्रासदी, भारत के लिए भी चेतावनी
नेपाल की यह त्रासदी भारत के लिए भी उतनी ही गंभीर चेतावनी है। हिमालय राजनीतिक सीमाओं से बंटा हो सकता है, लेकिन उसकी नदियां सीमाओं को नहीं मानतीं। नेपाल से निकलने वाली नदी प्रणालियां भारत के बड़े भूभाग और करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ी हैं। ताजा आपदा के बाद भारत ने नेपाल को राहत सामग्री और आवश्यक दवाएं भेजीं तथा बचाव एवं राहत प्रयासों में सहयोग बढ़ाया है।यही तथ्य बताता है कि भारत और नेपाल के बीच आपदा प्रबंधन केवल सद्भावना का विषय नहीं, बल्कि साझा सुरक्षा की आवश्यकता है। मौसम, नदी जलस्तर, ग्लेशियरों और संभावित भूस्खलन से जुड़ी सूचनाओं का वास्तविक समय में आदान-प्रदान हो तथा खतरे की सूचना सीमा के दोनों ओर बसे गांवों तक समय से पहुंचे।इस दिशा में ठोस व्यवस्था अब टाली नहीं जानी चाहिए।
सवाल विकास का नहीं, विकास के तरीके का है
नेपाल हो या भारत का हिमालयी क्षेत्र, सड़कें, बिजली, पर्यटन, रोजगार और बेहतर जीवन की सुविधाएं जरूरी हैं। पर्वतीय क्षेत्रों को विकास से वंचित नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि विकास किस कीमत पर और किस वैज्ञानिक आधार पर किया जा रहा है?पहाड़ों को काटकर सड़कें बनाना, नदियों के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र में निर्माण करना, जंगलों का अनियंत्रित दोहन और पर्यावरणीय क्षमता की अनदेखी करना लंबे समय में भारी कीमत वसूल सकता है। पहाड़ की ढलान पर किया गया एक गलत हस्तक्षेप नीचे पूरी घाटी के लिए खतरा बन सकता है।इसलिए पर्यावरणीय अध्ययन को परियोजनाओं की राह में महज औपचारिक बाधा मानने के बजाय विकास की अनिवार्य शर्त बनाना होगा। हिमालय में विकास की गति से ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी वहन क्षमता है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चुनौती
हिमालयी क्षेत्र पहले से ही भूगर्भीय रूप से संवेदनशील है। इसके साथ तापमान में बदलाव, ग्लेशियरों का पीछे हटना, बर्फ और पर्माफ्रॉस्ट की स्थिति में परिवर्तन तथा अत्यधिक मौसम की घटनाओं का बढ़ता जोखिम नई चुनौतियां पैदा कर रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों में तेजी से बदलाव दर्ज किए जा रहे हैं और इससे पर्वतीय आपदाओं के जोखिम को गंभीरता से समझने की जरूरत बढ़ी है।लेकिन हर आपदा का दोष केवल जलवायु परिवर्तन पर डाल देना भी समाधान नहीं है। स्थानीय स्तर पर अनियोजित निर्माण, नदी किनारे अतिक्रमण, वनों की कटाई और संवेदनशील इलाकों में बढ़ती मानवीय गतिविधियों की समीक्षा भी उतनी ही जरूरी है।
राहत से आगे बढ़कर रोकथाम की नीति जरूरी
आपदा आने के बाद हेलीकॉप्टर भेजना, राहत सामग्री पहुंचाना और बचाव अभियान चलाना जरूरी है। लेकिन आधुनिक आपदा प्रबंधन की असली सफलता इस बात में है कि आपदा आने से पहले कितने लोगों को सुरक्षित कर लिया गया।इसके लिए पर्वतीय क्षेत्रों में अत्याधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करनी होगी। उपग्रह, मौसम पूर्वानुमान, नदी जलस्तर निगरानी और स्थानीय सेंसरों से मिलने वाली जानकारी को गांव स्तर तक पहुंचाने की व्यवस्था होनी चाहिए। केवल इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क पर निर्भर रहने के बजाय सायरन, सामुदायिक रेडियो, स्थानीय चेतावनी केंद्र और प्रशिक्षित स्वयंसेवकों का मजबूत नेटवर्क तैयार करना होगा।
भारत-नेपाल को बनानी होगी साझा आपदा नीति
नदी का पानी सीमा देखकर अपना रास्ता नहीं बदलता। इसलिए बाढ़ और भूस्खलन की चुनौती का समाधान भी सीमा के भीतर सीमित नहीं हो सकता। भारत और नेपाल को साझा नदी घाटियों के लिए एकीकृत पूर्व चेतावनी और आपदा प्रतिक्रिया प्रणाली विकसित करने पर गंभीरता से काम करना चाहिए।नेपाल की मौजूदा त्रासदी में भी भारत ने मानवीय सहायता बढ़ाई है। राहत सामग्री, दवाएं और अन्य आवश्यक वस्तुएं भेजी गई हैं तथा भारतीय नागरिकों की स्थिति पर भी नजर रखी जा रही है।यह सहयोग संकट की घड़ी में महत्वपूर्ण है, लेकिन भविष्य की चुनौतियों के लिए दीर्घकालिक संस्थागत व्यवस्था इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण होगी।
पुनर्निर्माण ऐसा हो जो अगली आपदा को न्योता न दे
हर आपदा के बाद सड़क, पुल और भवन दोबारा बना देना पुनर्निर्माण नहीं है। यदि उसी स्थान पर, उसी डिजाइन और उसी जोखिम के साथ फिर निर्माण कर दिया गया तो अगली आपदा में वही ढांचा दोबारा तबाह हो सकता है।
पर्वतीय क्षेत्रों में पुनर्निर्माण की नीति ‘बिल्ड बैक बेटर’ के सिद्धांत पर आधारित होनी चाहिए। प्रभावित परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर बसाना, आजीविका बहाल करना, बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करना और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप मजबूत बुनियादी ढांचा तैयार करना जरूरी है।
हिमालय संसाधन नहीं, जीवन-व्यवस्था है
हिमालय को केवल पर्यटन, जलविद्युत या खनिज संसाधनों के भंडार के रूप में देखने की सोच बदलनी होगी। जंगल मिट्टी को थामते हैं, नदियां जीवन देती हैं और ग्लेशियर विशाल क्षेत्र की जल-व्यवस्था का आधार हैं। इन प्राकृतिक प्रणालियों के साथ छेड़छाड़ का असर केवल पहाड़ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मैदानों तक पहुंचता है।आज आवश्यकता किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र की साझा सोच की है। भारत, नेपाल, भूटान, चीन समेत हिमालय से जुड़े देशों के बीच जलवायु, ग्लेशियर, नदी, जैव-विविधता और आपदा प्रबंधन को लेकर वैज्ञानिक सहयोग बढ़ना चाहिए।
अब सवाल चेतावनी सुनने का है
नेपाल की बाढ़ हमें फिर एक ऐसे मोड़ पर खड़ा करती है जहां केवल राहत और मुआवजे की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी। हमें यह तय करना होगा कि विकास का अर्थ केवल बड़ी परियोजनाएं और तेज निर्माण है या फिर सुरक्षित जीवन, पर्यावरणीय संतुलन और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा भी विकास का हिस्सा है।
प्रकृति हमें बार-बार संकेत देती है
बदलते मौसम से, असामान्य वर्षा से, खिसकते पहाड़ों से और तेजी से बदलते ग्लेशियरों से। यदि इन संकेतों को लगातार नजरअंदाज किया गया तो हर अगली आपदा हमें पहले से अधिक महंगी पड़ सकती है।नेपाल की बाढ़ को एक और समाचार बनाकर भूल जाना सबसे बड़ी भूल होगी। यह हिमालय की चेतावनी है।राहत से आगे बढ़कर रोकथाम की, अनियंत्रित विकास से आगे बढ़कर संतुलित विकास की और राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर साझा जिम्मेदारी की।
क्योंकि सवाल सिर्फ नेपाल का नहीं है।सवाल हिमालय का है।
सवाल उन करोड़ों लोगों के भविष्य का है, जिनकी जिंदगी हिमालय की नदियों और पहाड़ों से जुड़ी है।

