“मैं देश नहीं बिकने दूंगा” के बीच बिकी देश की एकमात्र सरकारी आयुर्वेदिक दवा कंपनी
145 करोड़ की नेटवर्थ, 40 एकड़ सरकारी जमीन और 1200 दवाओं का लाइसेंस… फिर सिर्फ 121 करोड़ में क्यों बिकी IMPCL.?

नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर अपने भाषणों में कहते रहे हैं, “मैं देश नहीं बिकने दूंगा।” लेकिन उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थित देश की एकमात्र सरकारी आयुर्वेदिक एवं यूनानी दवा निर्माता कंपनी इंडियन मेडिसिन्स फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IMPCL) के निजीकरण ने इस दावे पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।केंद्र सरकार ने IMPCL में अपनी 100 प्रतिशत हिस्सेदारी 121.01 करोड़ रुपये में निजी कंपनी स्काईमैप फार्मास्युटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड को बेचने का फैसला किया है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार यह बोली आरक्षित मूल्य से अधिक थी, लेकिन आलोचकों का सवाल है कि 145 करोड़ रुपये से अधिक की नेटवर्थ, 40 एकड़ सरकारी भूमि, दशकों पुरानी ब्रांड वैल्यू और 1200 प्रकार की औषधियां बनाने के लाइसेंस वाली कंपनी का मूल्यांकन आखिर इतना कम कैसे हुआ.? वर्ष 1978 में स्थापित IMPCL वर्तमान में 575 से अधिक आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं का उत्पादन कर रही थी। उसकी आपूर्ति केंद्रीय अस्पतालों, अनुसंधान संस्थानों और विभिन्न राज्यों के सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों तक होती रही है। आयुष क्षेत्र में यह कंपनी सरकारी उपस्थिति का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती थी।निजीकरण के फैसले के बाद कर्मचारियों में भारी असंतोष है। कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि सरकार ने रोजगार सुरक्षा और भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं दिया। इसी के विरोध में कर्मचारी संघ ने आंदोलन और धरना शुरू करने की घोषणा की है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार “आत्मनिर्भर भारत” और भारतीय चिकित्सा पद्धति को वैश्विक पहचान दिलाने की बात कर रही है, तब आयुर्वेद क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण सरकारी कंपनी को निजी हाथों में सौंपने की क्या मजबूरी थी? क्या सरकार स्वयं इस क्षेत्र को आगे बढ़ाने में असमर्थ थी, या फिर यह केवल विनिवेश लक्ष्य पूरा करने की कवायद है..?सरकार का पक्ष है कि यह रणनीतिक विनिवेश प्रक्रिया के तहत लिया गया निर्णय है और इससे कंपनी को निजी क्षेत्र की दक्षता का लाभ मिलेगा। लेकिन विपक्ष, कर्मचारी संगठन और स्थानीय लोग पूछ रहे हैं कि क्या लाभ कमाने वाली और राष्ट्रीय महत्व की संपत्ति को बेच देना ही सुधार का एकमात्र रास्ता है..? IMPCL का निजीकरण केवल एक कंपनी की बिक्री नहीं, बल्कि सरकार की विनिवेश नीति पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर उभरा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बन सकता है।

