रक्षासूत्र केवल धागा ही नहीं,बल्कि विश्वास, कर्तव्य और संरक्षण का संकल्प है : आचार्य अर्जुन तिवारी
श्रावणी पूर्णिमा पर आज मनाया जा रहा रक्षाबंधन, शुभ मुहूर्त में राखी बांधने के साथ प्रेम, संस्कार और जिम्मेदारी निभाने का संदेश

अयोध्या ! श्रावण शुक्ल पूर्णिमा का पावन पर्व रक्षाबंधन शुक्रवार को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और परस्पर संरक्षण का प्रतीक यह पर्व भारतीय संस्कृति में महज एक पारिवारिक परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ा संस्कार है। बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उसके सुख, समृद्धि और दीर्घायु की कामना करती है तो भाई भी बहन के सम्मान, सुरक्षा और हर परिस्थिति में साथ निभाने का संकल्प लेता है।
पंचांग के अनुसार इस वर्ष पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त को सुबह 9:08 बजे शुरू होकर 28 अगस्त को सुबह 9:48 बजे तक रहेगी। 27 अगस्त को भद्रा का प्रभाव होने के कारण रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त को मनाया जा रहा है। अयोध्या और आसपास के क्षेत्र के लिए उपलब्ध पंचांग गणनाओं के अनुसार भी 28 अगस्त को ही पर्व मनाने की परंपरा उपयुक्त मानी गई है।
सुबह 5:41 से 9:48 बजे तक राखी बांधने का शुभ समय
पंचांग के अनुसार उत्तर प्रदेश के प्रयागराज क्षेत्र के लिए रक्षा सूत्र बांधने का मुहूर्त सुबह 5:41 बजे से 9:48 बजे तक है। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय के अंतर के कारण मुहूर्त में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है। इस वर्ष 28 अगस्त को भद्रा सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो चुकी है, इसलिए इस अवधि में रक्षाबंधन की रस्म की जा सकती है।
रक्षासूत्र बांधते समय इस मंत्र का प्रयोग करें
राखी बांधते समय भाई को स्वच्छ वस्त्र पहनाकर आसन पर बैठाने, तिलक, अक्षत, पुष्प और मिठाई के साथ पूजा करने के बाद रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा है। रक्षा सूत्र बांधते समय बहन द्वारा यह मंत्र पढ़ा जाता है।
“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”
अर्थात जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली दानवराज बलि को बांधा गया था, उसी रक्षा सूत्र से मैं तुम्हें बांधती हूं। हे रक्षा सूत्र! तुम अपने संकल्प से कभी विचलित न होना। इस मंत्र का उल्लेख श्रावण माहात्म्य के संदर्भ में भी मिलता है।
‘राखी का धागा रिश्ते से आगे कर्तव्य का संकल्प’
श्रीमद्भागवत एवं श्रीरामकथा प्रवक्ता और संकटमोचन हनुमान मंदिर, बड़ागांव, श्रीअयोध्याजी के संरक्षक आचार्य अर्जुन तिवारी ने कहा कि रक्षाबंधन को केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित करके देखना पर्व की व्यापक भावना को छोटा करना होगा। “रक्षा सूत्र वास्तव में विश्वास, कर्तव्य, सम्मान और संरक्षण का प्रतीक है। बहन जब भाई की कलाई पर राखी बांधती है तो वह केवल एक धागा नहीं बांधती, बल्कि उसके सुख-दुख में साथ रहने और उसके मंगल की कामना का संकल्प व्यक्त करती है। वहीं भाई भी बहन के सम्मान और सुरक्षा के साथ उसके आत्मविश्वास को मजबूत करने की जिम्मेदारी स्वीकार करता है।उन्होंने कहा कि आज के बदलते सामाजिक परिवेश में रक्षाबंधन के संदेश को और व्यापक बनाने की आवश्यकता है। “रक्षा का अर्थ केवल किसी बाहरी संकट से बचाना नहीं है। हमें अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को समझना होगा। यदि रक्षा सूत्र बांधते समय हम सत्य, करुणा, संयम, सदाचार और परस्पर सम्मान का संकल्प लें तो इस पर्व की सार्थकता कई गुना बढ़ सकती है।”
आचार्य तिवारी के अनुसार भारतीय संस्कृति में पर्व केवल उत्सव नहीं बल्कि जीवन-मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम हैं। रक्षाबंधन भी यही सिखाता है कि रिश्ते अधिकार से नहीं, बल्कि विश्वास और जिम्मेदारी से मजबूत होते हैं। गुरु-शिष्य, मित्र, समाज और राष्ट्र के स्तर पर भी ‘रक्षा’ का भाव इसी व्यापक दृष्टि से समझा जा सकता है।
उन्होंने कहा कि श्रावण मास की हरियाली, वर्षा और आध्यात्मिक वातावरण के बीच आने वाली श्रावणी पूर्णिमा मनुष्य को भीतर से भी शुद्ध होने का संदेश देती है। “रक्षा सूत्र बांधते समय हमें यह भी संकल्प लेना चाहिए कि मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट नहीं देंगे तथा अपने भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय पाने का प्रयास करेंगे। यही रक्षाबंधन की वास्तविक आध्यात्मिक भावना है।आचार्य अर्जुन तिवारी ने रक्षाबंधन के पावन अवसर पर देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह पर्व प्रत्येक परिवार में स्नेह, विश्वास, सौहार्द, संस्कार और परस्पर सम्मान को मजबूत करे तथा समाज में एक-दूसरे की रक्षा और सहयोग की भावना को नई ऊर्जा प्रदान करे।

