चौपाल परिवार की ओर से आज का प्रातः संदेश आचार्य अर्जुन तिवारी की कलम से

चौपाल प्रेमियों ! भारत एक कृषि प्रधान देश है | यहां समय-समय पर त्यौहार एवं पर्व मनाए जाते रहे हैं | यह सभी पर्व एवं त्योहार कृषि एवं ऋतुओं पर विशेष रूप से आधारित होते थे | इन त्योहारों में परंपरा के साथ साथ आस्था भी जुड़ी होती थी | हमारे त्योहार हमारी संस्कृति का दर्पण होते थे , जो कि समाज में आपसी मेल मिलाप का आधार हुआ करते थे | इन्हीं त्यौहारों के माध्यम से लोग एक दूसरे से अपने मन का मैल भूल कर के मिला करते थे | भारतीय त्योहारों की एक विशेषता रही है कि लगभग सभी त्यौहार सामूहिक रूप से मनाए जाते हैं इसमें ऊँच – नीच का भेदभाव कदापि नहीं होता था | होली हो दीपावली हो मकर संक्रांति हो या फिर दुर्गापूजा , सभी त्यौहार सभी वर्ण व सभी वर्ग के लोग एक साथ मिलकर बनाया करते हैं | ऐसी परंपरा विश्व में कहीं भी देखने को नहीं मिलती है | हमारे यहां समय-समय पर तीर्थ स्थलों की परिक्रमा करने का पावन पर्व भी आता है जहां चाहे वह धनी हो चाहे निर्धन सभी एक साथ अपनी आस्था अपने आराध्य के प्रति समर्पित करते रहे हैं | यही हमारे देश की विशेषता है कि यहां अनेकता में एकता देखने को मिलती है।आज हमें यह कहना पड़ रहा है कि युग बदल गये , समय बदल गया और समय के साथ साथ जीवन के सभी पहलुओं में भी बदलाव आया है | यह सत्य है कि परिवर्तन समय की मांग होती है यदि आप समय के साथ नहीं चलेंगे तो पीछे छूट जाएंगे , लेकिन इसका मतलब यह नहीं हुआ कि हमें प्रत्येक परिवर्तन को स्वीकार कर लेना चाहिए | यदि परिवर्तन सकारात्मक है तब तो हमें परिवर्तित हो जाना चाहिए अन्यथा नहीं | आज हमारे त्यौहारों का स्वरूप भी बदल गया है | मैं “आचार्य अर्जुन तिवारी” यह कह सकता हूं कि आज त्योहारों का भी व्यवसायीकरण हो गया है | आज एक विशेष चीज देखने को मिलती है कि त्यौहार कोई भी हो उसमें उपहार देने की परम्परा का प्रचलन हो गया है | यह उपहार देने की परम्परा एक बार पुन: धनी एवं निर्धन का भेदभाव पैदा करने वाला प्रतीत हो रहा है , क्योंकि पहले मनुष्य निष्काम भाव से उपहार दिया करता था परंतु अब उपहार की कीमत देख कर के तब सम्मान दिया जाने लगा है | जहां पहले त्योहारों में प्रत्येक घर में एक सप्ताह पहले से ही मिष्ठान्न बनने के कार्य शुरू हो जाते थे वही आज सब कुछ बाजार में उपलब्ध है | आज नर – नारी दोनों की व्यस्तता है अत: इन व्यस्तताओं के चलते अपने घर के मिष्ठान्न न खाना सपना सा हो गया है | आज हमारी तरह हमारे त्यौहार भी आधुनिक हो गए हैं | मैं यही कहना चाहूंगा कि प्रत्येक त्यौहार में भावना एक ही है एवं प्रत्येक त्यौहार भावनात्मक रूप से मनाना चाहिए।विशेष रूप से त्योहारों पर रात – रात भर युवाओं का घूमना एवं अनर्गल क्रियाकलाप करना भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं रही है।परंतु आज ऐसा देखने को मिल रहा है जो कि उचित नहीं है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !! © KKC News