आसान नहीं हैं सपा-बसपा गठबंधन, इन मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर पेंच फंसना तय

हाल ही में 5 राज्यों के चुनाव परिणामों ने मरे हुए विपक्ष को भरपूर ऑक्सीजन देने का काम किया. 2019 लोकसभा चुनाव के लिए विपक्ष गठबंधन की राजनीति पर जोर दे रहा है. सभी की नजरे देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश पर हैं. यहाँ गेस्ट हाउस कांड के बाद से समाजवादी पार्टी की धुर विरोधी रहीं बहुजन समाजवादी पार्टी की प्रमुख मायावती ने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है. यूपी में इससे पहले सपा-बसपा ने फूलपुर और गोरखपुर उपचुनाव मिलकर लड़ा था जिसमें उन्हें बीजेपी का तिलिस्म तोड़ने में सफलता मिली थी, दोनों पार्टियों फिर से वही करिश्मा दोहराना चाहती हैं.

राजनीतिक जानकरों की मानें तो दोनों ही पार्टियों के लिए उपचुनाव वाला गणित लोकसभा चुनाव में लगाना आसान नहीं होगा. सीटों के बंटवारे में पेंच फंसना तय माना जा रहा है. हाल ही में हुए मध्य प्रदेश विधानसभा में देखा गया कि कांग्रेस के मोलभाव के कारण ही मायावती ने गठबंधन से इंकार कर दिया था इस लिहाज से यह माना जा रहा है कि मायावती से मोलभाव करना अखिलेश के लिए इतना आसान नहीं होने जा रहा. बता दें कि मौजूदा समय में बसपा के पास एक भी लोकसभा सांसद नहीं है, वहीं सपा के पास 7 सांसद हैं.

इस फार्मूले से होता है सीटों का बंटवारा

आम तौर पर गठबंधन को लेकर जो फॉर्मूला तय होता है उसमें जिस सीट पर जिसका कब्जा होता है वो तो उसी को मिलती है. फिर देखा जाता है कि पिछले चुनाव में किस सीट पर उस राजनीतिक दल का उम्मीदवार दूसरे स्थान पर था. इस लिहाज से यदि 2014 के आम चुनावों को आधार पर बनाया जाए तो बसपा 34 सीटों पर दूसरे स्थान पर थी और सपा 31 सीटों पर दूसरे स्थान पर थी. वहीं 80 लोकसभा सीटों में बाकी की बची सीटों को वोट प्रतिशत के आधार पर बांटा जा सकता है. लेकिन सपा-बसपा गठबंधन में असल पेच मुस्लिम बहुल सीटों पर फंस सकता है.

बसपा ने विधानसभा चुनाव में 100 मुस्लिमों को दिया था टिकट

यादव-मुस्लिम समीकरण को अपना आधार मानने वाली सपा अपना अल्पसंख्यक आधार खोना नहीं चाहेगी. वहीं, बसपा मुस्लिमों को अपने खेमे में लाने का प्रयास करती रही है. इसी उद्देश्य से साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा ने 100 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों को उतारा था. जबकि सपा, कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ी थी. ऐसे में सपा और बसपा के उम्मीदवारों में वोटों का बिखराव हो गया जिसका फायदा भाजपा को हुआ था.

इन मुस्लिम सीटों पर फंस सकता है पेंच

मुस्लिम आबादी के लिहाज से रामपुर, मुरादाबाद, सहारनपुर, बिजनौर और अमरोहा ऐसी लोकसभा सीटें हैं जहां मुस्लिम आबादी 35 से 50 फीसदी के बीच है. वहीं मेरठ, कैराना, बरेली, मुजफ्फरनगर, संभल, डुमरियागंज, बहराइच, कैसरगंज, लखनऊ, शाहजहांपुर और बाराबंकी में मुस्लिम आबादी 20 फीसदी से ज्यादा और 35 फीसदी से कम है. हाल के दिनों में बसपा ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में अपना अल्पसंख्यक आधार बढ़ाया है. लिहाजा, यही वो सीटें हैं जिन्हें लेकर पेच फंस सकता है.

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