72 साल पहले राम जन्मभूमि विवाद की भड़की आग से सियासती लोग आज भी सेंक रहे अपनी रोटी,न्याय के अंतिम चौखट पर भी खूब हुई देरी,जानें कब क्या हुआ

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अयोध्या ! राम मंदिर का मुद्दा इन दिनों फिर जोर पकड़ रहा है। सोशल मीडिया पर चल रही बहस की मानें तो एक बड़ा पक्ष ये मान रहा है कि ये सब 2019 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है। खैर बात जो भी हो लेकिन डर पूरी तरह से बना हुआ है। 25 नवंबर को अयोध्या जिसे राम जन्मभूमि भी कहा जाता है पर विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा धर्म संसद के लिए हिन्दुओं का आवाहन किया है। इसे लेकर 1992 में हुए बाबरी विध्वंस का डर भी लोगों के दिमाग में चलने लगता है। देश के हालात भी बिगड़ सकते हैं।एक पक्ष का ये भी मानना है कि राम मंदिर मुद्दा संघ के दिमाग की उपज है जो हर बार चुनाव के दौरान जनसंघ से लेकर बीजेपी तक सांप्रदायिक रूप से जनता को बांट कर वोट पाने के लिए उठाया जाता रहा है। खैर आरोप प्रत्यारोप तो लगते ही रहते हैं, मुख्य बात ये है कि ये मुद्दा उठाया कब से जा रहा है।

आइए जानते हैं कि राम मंदिर से जुड़ीं कुछ खास बातें

कहा जाता है कि 1528 में भारत में आये पहले मुग़ल शासक बाबर के सेनापति मीर बाकी ने राम जन्मभूमि पर एक मस्जिद बनवाई जिसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना गया। राम मंदिर बनाने के पक्षधर ये आरोप लगते हैं कि वहां पहले से ही राम जी का मंदिर था जिसे मीर बाकी ने तोड़ कर वहां मस्जिद बनाई।वो भूमि जहां राम जी का जन्म हुआ वहां मस्जिद का खड़ा होना कभी से हिन्दुओं के मन का नहीं था।इसके लिए पहला विरोध जो इतिहास में दर्ज हुआ वो सन 1853 में। यही वो वर्ष था जब राम मंदिर और बाबरी मस्जिद को लेकर पहला सांप्रदायिक दंगा हुआ। बताया जाता है कि इस दंगे में 70 मुस्लिम मारे गए थे। इसी दंगे में मस्जिद के ढांचे का एक हिस्सा गिरा दिया गया था। बता दें कि इस समय तक संघ का उदय नहीं हुआ था।इसके बाद सन 1885 में पहली बार राम मंदिर का मुद्दा कोर्ट में पहुंचा। राम मंदिर को लेकर निर्मोही अखाड़े के महंत रघुवीर दास पहली कानूनी प्रक्रिया के लिए कोर्ट पहुंचे। अखाड़े की मांग थी कि राम चबूतरे पर छतरी बनवाने की अनुमति दी जाए। लेकिन 1886 को फैजाबाद की जिला अदालत के जज एफ इ ए चमेर ने इस याचिका को ये कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि “ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिन्दुओं की आस्था से जुड़ी भूमि पर मस्जिद बना दी गई। लेकिन इस बात को 356 साल बीत चुके हैं, ये किसी भी शिकायत पर फैसला सुनाने के लिए बहुत लंबा समय है।”1934 में बाबरी मस्लिद के ढांचे को फिर से गिराने की कोशिश की गई तथा इसके तीन गुंबद गिरा भी दिए गए लेकिन फैजाबाद (अब अयोध्या) के एक कलक्टर ने इसका पुनर्निर्माण करा दिया। बता दें कि इस समय तक विश्व हिंदू परिषद् वजूद में नहीं आई थी।इसके बाद राम मंदिर चर्चा में आया आजादी के वर्ष यानी 1947 में, जब भारत सरकार ने मस्जिद के मुख्य द्वार पर ताला लटकाते हुए मुसलमानों को ये आदेश दिया कि वो इस विवादित स्थल से दूर रहेंगे। बताया जाता है कि जहां मुसलमानों के लिए मस्जिद के द्वार बंद कर दिए गए वहीं हिंदू श्रद्धालुओं को एक अलग जगह से प्रवेश दिया जाता रहा।इससे पहले इस मस्जिद को बाबरी मस्जिद, मस्जिद ए जन्मभूमि जैसे नामों से जाना जाता था लेकिन 1950 में महंत परमहंस रामचंद्र दास द्वारा हिंदू प्रार्थनाएं जारी रखने और विवादित ‘ढांचे’ में राममूर्ति को रखने के लिए मुकदमा दायर करने के साथ ही मस्जिद को ‘ढांचा’ नाम दिया गया। इसी साल गोपाल सिंह विशारद ने भी फैजाबाद अदालत में एक अपील दायर कर रामलला की पूजा-अर्चना की विशेष इजाजत मांगी थी। ये वर्ष 1961 था जब उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने इस विवादित ढांचे के मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर किया।सन 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने हिंदुओं का आवाहन कर एक अभियान शुरू किया जिसमें दोबारा राममंदिर बनाने के लिए जमीन देने की मांग की गई। सन 1986 में जिला मजिस्ट्रेट ने हिंदुओं को प्रार्थना करने के लिए विवादित मस्जिद पर से ताला हटा कर इसके दरवाजे खोलने का आदेश दिया। इस आदेश के बाद मुसलमानों ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन किया।1989 ही वो वर्ष था जब इलाहाबाद उच्च न्यायलय ने ये आदेश दिए कि विवादित स्थल के मुख्य द्वारों को खोलते हुए इस जगह को हमेशा के लिए हिंदुओं को दे देना चाहिए। इस फैसले के बाद सांप्रदायिक ज्वाला तब भड़की जब विवादित स्थल पर स्थित बाबरी मस्जिद को विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने कुछ नुकसान पहुंचाया। जब भारत सरकार के आदेश के अनुसार इस स्थल पर नये मंदिर का निर्माण शुरू हुआ तब मुसलमानों के विरोध ने सामुदायिक गुस्से का रूप लेना शरु किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने वार्ता के जरिए विवाद सुलझाने के प्रयास किए मगर अगले वर्ष वार्ताएं विफल हो गईं।

6 दिसंबर 1992 का दिन इतिहास के पन्नों पर दो तरह से लिखा गया। देश भर में कहीं इस दिन को विजय दिवस कहा जाता है तो कहीं काला दिवस। दिवस भले दो हों लेकिन कारण एक ही रहा और वो था बाबरी विध्वंस। बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ ही यह मुद्दा सांप्रदायिक हिंसा और नफरत का रूप लेकर पूरे देश में संक्रामक रोग की तरह फैलने लगा। इन दंगों में 2000 से ऊपर लोग मारे गए। मस्जिद विध्वंस के 10 दिन बाद मामले की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन किया गया।उच्च न्यायालय के आदेश पर भारतीय पुरात्तव विभाग ने विवादित स्थल पर 12 मार्च 2003 से 7 अगस्त 2003 तक खुदाई की जिसमें एक प्राचीन मंदिर के प्रमाण मिले। वर्ष 2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायल की लखनऊ बेंच में 574 पेज की नक्शों और समस्त साक्ष्यों सहित एक रिपोर्ट पेश की गयी। भारतीय पुरात्तव विभाग के अनुसार खुदाई में मिले भग्वशेषों के मुताबिक विवादित स्थल पर एक प्रचीन उत्तर भारतीय मंदिर के प्रचुर प्रमाण मिले थे। विवादित स्थल पर 50X30 के ढांचे के मंदिर के प्रमाण मिले।5 जुलाई 2005 को 5 आतंकियों ने अयोध्या के राम मंदिर पर हमला किया। इस हमले का मौके पर मौजूद सीआरपीएफ जवानों ने वीरतापूर्वक जवाब दिया और पांचों आतंकियों को मार गिराया।24 सितंबर 2010 को दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने फैसले की तारीख मुकर्रर की थी। फैसले के एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को टालने के लिए की गयी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए इसे 28 सितंबर तक के लिए टाल दिया। बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने 30 सितम्बर को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटा जिसमें एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े में जमीन बंटी। हालांकि 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहबाद उच्च न्यायालय के इस फैसले पर रोक लगा दी थी।1534 में राम जन्मभूमि पर बनी मस्जिद को लेकर 1853 से उठ रहा विवाद आज तक चल रहा है। सबको इसी का इतंजार है कि ये मुद्दा कब सुलझे।

जानकारी स्रोत :- गूगल

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