March 24, 2026
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नई दिल्ली ! जिंदगी और मौत के बीच 13 वर्षों तक जूझते रहे हरीश राणा की संघर्ष भरी कहानी मंगलवार को दर्दनाक अंत के साथ समाप्त हो गई। दिल्ली के एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इच्छामृत्यु की अनुमति मिलने के बाद उनका इलाज चरणबद्ध तरीके से बंद किया गया था।करीब 32 वर्षीय हरीश राणा वर्ष 2013 में एक गंभीर हादसे का शिकार हो गए थे, जिसके बाद वह ‘वेजिटेटिव स्टेट’ में चले गए। तब से लेकर अब तक वह न तो बोल सके, न ही सामान्य जीवन जी पाए। बीते 13 वर्षों में उनका पूरा परिवार उम्मीद और पीड़ा के बीच झूलता रहा।आखिरकार, बेटे की इस असहनीय स्थिति को देखते हुए परिजनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 11 मार्च 2026 को कोर्ट ने मानवीय आधार पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी। इसके बाद 14 मार्च को हरीश को दिल्ली एम्स के पैलिएटिव केयर यूनिट में भर्ती कराया गया, जहां मेडिकल बोर्ड की निगरानी में उनके इलाज को धीरे-धीरे रोका गया।करीब 11 दिनों तक चली इस संवेदनशील प्रक्रिया के बाद मंगलवार को हरीश ने अंतिम सांस ली। यह मामला देश में इच्छामृत्यु से जुड़ा एक अहम उदाहरण बन गया है, जिसने कानून, चिकित्सा और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन पर नई बहस छेड़ दी है।हरीश राणा की कहानी केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि उस परिवार के दर्द की दास्तान है, जिसने वर्षों तक उम्मीदों के सहारे जीवन बिताया। उनके निधन से परिजनों में गहरा शोक व्याप्त है।

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